Saturday, March 20, 2010

जिंदगी का मतलब जीना है तमाशगीरी नहीं!

जिंदगी का मतलब जीना है तमाशगीरी नहीं। कहीं चलते-फिरते यह लाइन पढ़ी तो सोचने पर मजबूर हो गया कि लेखक आखिर साबित क्या करना चाहता है। भला तमाशगीरी के बिना भी कोई जीना हुआ। हो सकता है बैलगाड़ियों के दौर में यह बात वाजिब रही हो लेकिन फार्मूला कार के जमाने में तो फिजूल ही करार दी जाएगी। ब्रांडेड कपड़ों और जूतों पर टीका-टिप्पणी करने वाले लोग अब बचे कहां हैं। वहीं पांत में बैठकर जीमने वाले भी धीरे-धीरे निपट गए। बचे-खुचे लोगों को आउट डेटेड का तमगा मिल चुका है। ऐसे में अब कोई शोषेबाजी करना भी चाहे तो भला ऐतराज क्यों और किसे होना चाहिए, और फिर हम क्यों भूल सकते हैं कि मीडिया के अनुसार जो दिखता है, वही बिकता है। हम तो आधुनिक हैं, कहकर जी भरकर खुद को उघाड़ें भी तो कौन रोक लेगा। कालेज-कैंपसों में देश और समाज की समस्याओं के बारे में सोचने से ज्यादा आज के दौर में मोटे पैकेज पर नौकरी मिलना जरूरी हो चुका है। बौद्धिक नेतृत्व के नाम पर खुद का काम या कुछ और करने से बेहतर है किसी बनिए की नौकरी कर पूरी जिंदगी गुजार दी जाए। ड्रिंक और डिस्को वाला मजा भला भगवान भजन में तो आने से रहा। चूंकि सफलता भी अभिनय से ही आती है, इसलिए जो जितना बड़ा अभिनेता, वह उतना ही सफल। जीवन रूपी रंगमंच पर एक के बाद एक नाटक रचे जाना ही शायद बेहतर हो। आखिरकार जिंदगी भर अंग्रेजों को गरियाने वालों को जब भाषा के रूप में अंग्रेजीयत अपनाने में गुरेज नहीं हुआ तो भला हम को क्यों होगा। हम अंग्रेजों को कोसेंगे भी और अंग्रेजीयत का चोगा भी पहने रहेंगे क्योंकि हमें इस तमाशा में खुद को अव्वल जो साबित करना है।

2 comments:

  1. bhai sach kaha hai..........

    is manch ke madhyam se nayi dishon ki aasha hai....

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  2. Dr. Chandra MohanMarch 24, 2010 at 9:25 AM

    स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान महर्षि अरविन्द ने अपनी 'आर्य' नामक पत्रिका में युवको को देश का भाग्य बताया था.. आपके ब्लॉग ने उसकी याद ताजा कर दी.. बधाई

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