Tuesday, August 24, 2010

पीपली लाइव: गू नहीं यह छी-छी है..!

'पीपली लाइव' फिल्म के एक दृश्य में नत्था के बेटे से एक पत्रकार पूछता है कि स्कूल में मिड-डे-मील मिलता है या नहीं। बच्चा हां में जवाब देता है। यह देख-सुनकर व्यंग्य, विनोद और विस्मय तीनों का अहसास हो गया कि जिस पीपली गांव में भ्रष्ट नौकरशाही और नेताओं के गठजोड़ के चलते राज्य सरकार की लगभग सभी योजनाओं को बुरी गत हुई हो, वहां केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई मिड-डे-मील योजना खूब फल-फूल रही है। ऐसे में लगा कि फिल्म का नाम असल में 'पीपनी लाइव' तो नही है।

'पीपनी' हिंदी पट्टी क्षेत्र के लिए नया शब्द नहीं है। पुंगी बजाने और सपेरों वाली बीन से इतर पीपनी के मायने उस मिट्टी से जुड़े बच्चे आसानी से समझते हैं, जिनके हित में यह फिल्म बनाने का दावा किया गया। शुरू से लेकर आखिर तक फिल्म में निर्माताओं की पीपनी बजती रही। देश में किसान समस्याओं के खिलाफ, पब्लिक ट्रांसपोर्ट के खस्ताहाल साधनों के खिलाफ, भूख और गरीबी के खिलाफ, भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ और सबसे अहम मीडिया के मानसिक पतन के खिलाफ। लेकिन यह सब दिखाने के लिए जिस गंदगी को परोसा गया, वह उससे भी ज्यादा भौंडापन लिए था, जैसी यह चीजें वास्तव में दिखती हैं। ठीक उसी तरह जिसमें गंदगी को छी-छी कहकर हम उससे किनारा कर लेते हैं, कई जगह इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक अपने उद्देश्य से भटकते नजर आए।

फिल्म के पहले दृश्य से ही जिसमें नत्था की उल्टी पर फोकस किया गया है। साफ दिख जाता है कि फिल्म व्यावसायिक लाभ और विदेशी पुरस्कार हासिल करने के लिए बनाई गई है। अनावश्यक अपशब्दों का प्रयोग फिल्म को 'बी' ग्रेड फिल्मों के समकक्ष लाकर खड़ा कर देता है, तो मीडिया को बेवजह निशाने पर लेना तर्कसंगत कम छिछलेदार ज्यादा है। नत्था के मल का विश्लेषण करने के बहाने फिल्मकारों ने जहां एक ओर भारतीय मीडिया की जमकर भद पीटी, वहीं मुख्य प्रदेश के नाम पर गैर कांग्रेसी सरकारों को कठघरे में खड़ी करने मे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। इस सबके बीच एक तरह से केंद्र सरकार को क्लीन चिट सी दे दी गई है। और तो और फिल्म में राम की जगह शंकर को पदस्थापित करने की नाटकीयता भी पूरे ढंग से रची गई है। हम सभी जानते हैं कि आज भी उत्तर भारत के ज्यादातर गांवों में संबोधन 'जय राम जी' का होता है न कि जय शंकर की। शायद निर्माताओं को लगा कि जय राम जी के संवादों से राम की महिमा का बखान हो गया तो कहीं उनकी फिल्म की रिलीज न टल जाए। ऐसे में हर एक उस सीन पर कैंची चलाई गई जिससे केंद्र सरकार की छवि को नुकसान पहुंच सकता था। थोड़ा बहुत जो कहानी की मांग के अनुसार जरूरी था, वह कृषि मंत्रालय की भेंट चढ़ गया। यहां तक कि बेहद हिट हो चुके फिल्म के गाने 'महंगाई डायन...' का भी महज एक मुखड़ा ही पूरी फिल्म में सुनने को मिलता है। ऐसे में संवेदनशील विषयों को लेकर बनी यह फिल्म करीब दो घंटे में दर्शकों को सिनेमा हाल से बाहर कर देती है।

आज के दौर में जबकि आंचलिक अखबारों का चेहरा भी सकारात्मक खबरों के साथ बदल रहा है। कभी घटना आधारित रहा मीडिया अब 'सोच आधारित' हुआ है। गंदगी या कूड़े-करकट के फोटो अखबार के पन्नों से गायब होते जा रहे हैं। सामाजिक सरोकारों के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले लोगों की जमात नहीं सुधरी है। 'स्लमडाग मिलेनेयर' से 'पीपली लाइव' तक अपना छिद्रान्वेषण कराना एक चलन सा बन गया है। जिसमें 'गू' को छी-छी कहकर उस पर ईंट-पत्थर बरसाए जाते हैं। साफ करने के बजाए उसे छितराया जाता है। भले ही गंदगी के छींटे खुद हमारे दामन पर ही क्यों न आएं। कुल मिलाकर सोशल काॅज के नाम पर बनाई गई 'पीपली लाइव' अन्य मुंबईया फिल्मों की तरह विशुद्ध रूप से बाजार को ध्यान में रखकर तैयार की गई लगती है। फर्क बस इतना सा है कि इसमें बालीवुड फिल्मों की तरह एक आम आदमी और पत्रकार के मिलने पर भ्रष्ट तंत्र का सफाया नही होता बल्कि उसकी जीत होती है।







Sunday, July 25, 2010

वर्धा की खामोशी और गांधी जी का टेलीफोन केबिन

वैसे तो गांधी जी को भारत में किसी एक जगह से जोड़कर देखा जाना गलत होगा फिर भी साबरमती आश्रम के बाद अगर कोई जगह गांधी जी की सबसे पसंदीदा कही जा सकती है तो वह है वर्धा आश्रम। गांधी साहित्य में तमाम बार पढ़ चुके इस स्थान पर हाल ही में एक मित्र के साथ जाना हुआ। नागपुर से करीब 80 किमी दूर सेवाग्राम रेलवे स्टेशन पर उतरकर सीधे बापू की कुटिया पहुंचे। आश्रम में कदम रखते ही मैं उन सब जगहों और चीजों से रूबरू होने के लिए बेसब्र हो उठा, जो मैंने पढ़ी और सुनी थीं। खासतौर पर उस प्रार्थना स्थल को देखने का बड़ा मन था, जहां हर शाम को सभी आश्रमवासी एकत्रित होकर बापू की बात सुनते थे। एक और चरित्र था जिसके बारेे में गांधी जी और कस्तूरबा से ज्यादा जानने की इच्छा थी, वो थीं मेडलिन स्लेम या गांधी जी के दिए नाम से पुकारें तो-मीरा बेन। आश्रम के रास्ते में एक सड़क भी उनके नाम पर मिली।

           आश्रम में एक निर्बाध शांति छाई थी। इक्का दुक्का देशी पर्यटकों को छोड़ दें तो केवल एक दो आश्रम के लोग ही वहां नजर आ रहे थे। बापू की कुटिया में बापू के टेलीफोन का केेबिन अलग ही था। वहीं प्रार्थनास्थल के पीछे खादी के कपड़े बिक्री के लिए रखे थे। हमने कुर्ते खरीदने के बारे में अपनी इच्छा जाहिर की तो बताया गया कि केवल शर्ट मिलेंगी या फिर कपड़ा। कुर्तें वहां नहीं हैं। कुल मिलाकर कभी जन-जन की आजादी का जयघोष करने वाली इस जगह में सिर्फ खामोशी ही पसरी हुई दिखी। वो भी बिल्कुल किसी मातमपुर्सी के दिन की याद ताजा करती हुई। लगा जैसे गांधी जी की हत्या कल की ही बात हो।
         
        हालांकि आश्रम के एक दूसरे हिस्से में एक स्कूल में कुछ बच्चे जरूर पढ़ते हुए जिंदगी की बसावट को बयान करते नजर आए। एक कुआं भी था जिसे अब बंद कर जाली से ढक दिया गया है। काफी कुछ था देखने-दिखाने लायक- बा की रसोई, मीराबेन की कुटिया, आश्रम में लगा पीतल का घंटा। बापू की कुटिया में चटाइयां, लिखने-पढ़ने की चैकी समेत कई ऐतिहासिक चीजें खुद के उस व्यक्ति से जुड़े होने की गवाही दे रहीं थीं, जिसके बारे में आने वाली पीढ़ियों में से शायद ही कोई यकीन करे कि कभी धरती पर ऐसा भी एक व्यक्ति हुआ था। इस सबके बीच एक टेलीफोन केबिन ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सार्वजनिक जीवन जीने की वकालत करने वाले गांधी जी की कुटिया में निजता की पहचान माने जाने वाला टेलीफोन केबिन कुछ अटपटा सा लगा। उसमें उसी जमाने का एक टेलीफोन भी रखा था। शायद उस दौर में आश्रम में ऐसी खामोशी नहीं होती होगी, जैसी कि आज दिखती है। लोगों की भीड़ से आश्रम में शोरगुल जरूर ही होगा। वरना गांधी जी को अपनी बातचीत के लिए भला केबिन की आवश्यकता क्यों पड़ती। आश्रम के बाहर एक रेस्तरां में प्राकृतिक भोजन की व्यवस्था थी। टेबल कुर्सी के बजाए यहां चटाई पर विशुद्ध भारतीय तरीके से पालती मारकर भोजन करना भी आनंददायक रहा।

        यहां एक बात का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा कि पिछले साल तक मैं भी उन लोगों में से एक था जो बापू को भारत विभाजन के लिए दोषी मानते थे। वहीं जब फ्रांसीसी लेखिका कैथरीन क्लैमा की लिखी पुस्तक 'एडविना और नेहरू' पढ़ी तब जाकर पता चला कि राजनीतिक गांधी के पीछे सक्रिय दूसरे गांधी अनदेखे रह गए। उनके बारे में महत्वपूर्ण यही है कि उनकी नजर आम आदमी से कभी हटी नहीं और अंतिम आदमी उनकी नजर में हमेशा रहा।

Monday, April 26, 2010

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो....

सवाल यह नहीं कि मसला हल कौन करे, सवाल तो यह है कि पहल कौन करे। नासूर बन चुकी नक्सली समस्या पर कुछ ऐसा ही हाल है हमारे देश के नेताओं का। दंतेवाड़ा की घटना के बाद भी जितनी ढपली उतने राग की तर्ज पर हर कोई अपनी-अपनी कह रहा है। कोई भी एक दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं। कांग्रेसी घटना के लिए मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह से इस्तीफा देने की मांग कर रहे हैं तो उनके नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपनी ही सरकार के गृहमंत्री चिदंबरम की कार्यशैली पर अंगुली उठा रहे हैं। वहीं बीजेपी भी जडें खोद-खोदकर समस्या के लिए पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को कठघरे में खड़ा कर रही है। नक्सल प्रभावित इलाके में कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में उसके नेताओं के दौरों की जानकारी निकलवाई जा रही है।

           बहरहाल नेताओं में नक्सली समस्या जैसे संवेदनशील मुद्दे को हल करने पर भी आम सहमति अभी तक नहीं बन सकी है। अब जबकि गृह मंत्रालय को नक्सलियों से हिंसा छोड़ने का आग्रह बाकायदा अखबार में विज्ञापन देकर किया जा रहा है, इन नेताओं को धिक्कारने का मन करता है। महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष के इस देश में क्या एक भी ऐसा नेता नहीं बचा जो जनता को मोबिलाइज कर सके।

         मौजूदा दौर में जबकि हर नेता खुद के गरीबपरस्त होने की बात कहता है, किसी ने भी नक्सली समस्या के समाधान को जमीनी पहल नहीं की। माओवादियों के समर्थक हों या विरोधी, किसी ने भी ताड़मेटला या दंतेवाड़ा का रुख करना उचित नहीं समझा। अरे भाई! अगर माओवादियों के समर्थक हो तो जंगल के भटके लोगों से घबराना कैसा और विरोधी हो तो गुमराह हुए लोगों को समझाने में भला क्या अड़चन। दूर के नहीं तो कम से कम पास के ऐसे नेता तो गुमराह लोगों के पास जा ही सकते हैं जिन्होंने नक्सली हिंसा को नजदीकी से देखा हो। कमोबेश हर राजनीतिक दल के पास ऐसे नेताओं की अच्छी खासी संख्या है।

            हमें यह समझना होगा कि एअर कंडीशंड कमरों में बैठकर नक्सली समस्या का समाधान नहीं हो सकता। आज के दौर में नक्सली वास्तव में हताशा के चलते भटके हुए लोग हैं, जिनके बल पर माओवादी जीत बोलते हैं। अगर ऐसे लोगों को समाज की मुख्य धारा में लाया जाए तो कोई सूरत नहीं कि नक्सली समस्या जड़ से मिट जाएगी। जमीनी नेताओं की एक ईमानदारी कोशिश की देर भर है, माओवादियों की चूलें हिल जाएंगी और ऐसे नेताओं के लिए यह मौका भी होगा खुद को जन, जंगल, जमीन और जानवर का सच्चा हितैषी साबित करने का।

जवानों को कैनन फोडर तो न बनाएं!

बीते दिनों छत्तीसगढ से आगरा आते हुए ट्रेन में कुछ सीआरपीएफ के जवानों से बातचीत हुई तो नक्सली हिंसा के खौफनाक सच से वाकिफ हुआ। लगा कि कारगिल के युद्ध से ज्यादा खतरनाक तो जंगल की लड़ाई है। कारगिल में उंची चोटियों पर बैठे दुश्मन के बारे में जानकारी तो थी लेकिन नक्सल प्रभावित जंगल में किस पेड़ से या पत्तों के झुरमुट से जहरीला तीर गर्दन मेें आ लगे, कोई तो नहीं जानता। कारगिल में कुछ पता हो या न हो लेकिन गोली की दिशा  जरूर पता थी लेकिन जंगल में तो उसका भी पता नहीं। जाने किस ओर से गोली आ धंसे, कोई नहीं जानता।
बातचीत का लव्वोलुआब यह कि जंगल की लड़ाई का कोई स्टैंडर्ड आॅपरेटिंग प्रोसीजर नहीं होता। नियम भी सख्त होते हैं। जंगल में संभावित दुश्मन पर पहला फायर जवान अपनी ओर से नहीं कर सकते। क्या पता गोली किसी बेकसूर को लग जाए। दुश्मन सिर्फ वही माना जाएगा, जिसके पास हथियार हों या जो हमला करे। 40-45 किमी की पैट्रोलिंग और फिर जंगल की कठिन परिस्थितियां। ऐसे में कोई चूक हो भी जाए तो मानवाधिकार संगठनों और मुकदमों का डर। चाहकर भी दुश्मन को आगे बढ़कर नहीं दबोच पाते। शायद पीछे रहकर खतरा उठाना ही उनकी नियति बन चुका है। यात्रा के दौरान एक जवान ने कहा था कि हमें ऐसी लड़ाई में झोंका ज्यादा जाता है, जिसमें शहादत की संभावनाएं ज्यादा होती हैं और जीतने की कम। यह वाकया ताड़मेटला की घटना से पहले का है। अब सोचता हूं कि सीआरपीएफ के जवान गलत नहीं थे। बिना समुचित प्रशिक्षण के जंगल की अबूझ परिस्थितियों में जवानों को झोंककर कहीं कैनन फोडर तो नहीं बनाया जा रहा। अगर ताड़मेटला की घटना का सच भी ऐसा ही भयावह है तो यह हमारी चैन की नंीद के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सुरक्षाबलों के मनोबल को तोड़ने वाली नीति है, जो भविष्य में हमारे लिए अधिक दुखदायी साबित होगी।

आदिवासी और अनादिवासी के बीच का फर्क

आदिवासियों के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने वाले लोग यह नहीं जानते कि उन्हें आदिवासी कहकर वह पश्चिम की उस धारणा को और मजबूत करते हैं, जिसमें माना जाता है कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे, वह बाहर से आए थे और यहां आकर बस गए। अनजाने में वह उन्हें आदिवासी कहकर खुद को अनादिवासी मान लेते हैं। वास्तव में कोई कहां से आया यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि किसी के दिल में यह देश कहां बसता है और वह अपने लोगोें के हित में कैसा और कितना सोचता है यह महत्वपूर्ण है। भलमनसाहत की इसी नीयत पर जब सवाल उठते हैं तो शायद कहीं न कहीं सलवा जुडूम जैसी उन कोशिशों को धक्का लगता है, जो आदिवासी और अनादिवासी के बीच के इस फर्क को कम करने के लिए लगातार जारी हैं।

Wednesday, April 21, 2010

शब्दों की चौकीदारी संभव नहीं..


पानी और पर्यावरण पर काम के लिए जाने जाते हैं अनुपम मिश्र. अपनी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब' के साथ उन्होंने एक दूरगामी दृष्टि वाला प्रयोग किया. उन्होंने अपनी किताब पर किसी तरह का कापीराइट नहीं रखा. इस किताब की अब तक एक लाख से अधिक प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं! यहां प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-


सवाल- कापीराईट को लेकर आपका नजरिया यह क्यों है कि हमें अपने ही लिखे पर अपना दावा (कापीराईट) नहीं करना चाहिए?
जवाब- कापीराईट क्या है इसके बारे में मैं बहुत जानता नहीं हूं. लेकिन मेरे मन में जो सवाल आये और उन सवालों के जवाब में मैंने जो जवाब तलाशे उसमें मैंने पाया कि आपका लिखा सिर्फ आपका नहीं है. आप एक जीवन में समाज के किस हिस्से कब और कितना सीखते, ग्रहण करते हैं इसकी कोई लाईन खींचना कठिन काम है. पहला सवाल तो यही है कि मेरे दिमाग में जो है वह क्या केवल मेरा ही है? अगर आप यह मानते हैं कि आपका लिखा सिर्फ आपका है तो फिर आपको बहुत कुछ नकारना होगा. अपने आपको एक ऐसी ईकाई साबित करना होगा जिसका किसी से कोई व्यवहार नहीं है. न कुल परिवार से न समाज से. क्योंकि हम कुल, परिवार, समाज में बड़े होते हुए ही बहुत कुछ सीखते हैं और उसी से हमारी समझ बनती है. अगर आप कापीराईट का इतिहास देखें तो पायेंगे कि हमारे समाज में कभी कापीराईट की कोई प्रवृत्ति नहीं थी. अपने यहां कठिनत श्रम से प्राप्त की गयी सिद्धि को भी सिर्फ सेवा के निमित्त उपयोग की जाती है. मीरा, तुलसी, सूरदास नानक ने जो कुछ बोला, लिखा वह सब हाथ से कापियां लिखी गयीं. तमिलनाडु में ऐसे हजारों ग्रंथ हैं जो हाथ से लिखे गये और हाथ से लिखे ग्रंथ भी दो-ढाई हजार साल अनवत शुद्धत्तम स्वरूप में जिंदा रहे हैं. इसलिए यह कहना कि कापीराईट से मूल सामग्री से छेड़छाड़ होनी बच जाती है ऐसा नहीं है. िजनका जिक्र मैं कर रहा हूं वे सब बिना कापीराईट के भी शुद्धतम स्वरूप में लंबे समय तक बची रही हैं और आज भी विद्यमान हैं. उनको तो किसी कापीराईट एक्ट की जरूरत महसूस नहीं हुई फिर आपको क्यों होती है?
        कॉपीराईट का नियम अंग्रेजों के साथ भारत में आया लेकिन दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि किसी के मन में कभी यह सवाल और संदेह नहीं उठा कि आखिर हम कापीराईट का इस्तेमाल क्यों करें? महात्मा गांधी तक ने अपनी कापीराईट एक ट्रस्ट नवजीवन ट्रस्ट को पचास साल के लिए दे दिया था. अब पचास साल बाद गांधी के लिखे पर फिर कापीराईट हट गया है. तो फिर महज पचास साल के लिए इसका पालन करने से गांधी विचार भी नहीं बच सका. यह सब देखकर आश्चर्य होता ही है.

सवाल- लेकिन आज के इस व्यावसायिक युग में किसी का लिखा उसका व्यवसाय भी हो सकता है जिससे उसके जिंदगी की गाड़ी चलती है. वो भला अपना लिखा समाज को अर्पित कर दे तो अपना गुजारा कैसे करेगा?
जवाब- जिस दिन हम केवल कमाने के लिए लिखने लगेंगे उस दिन हमारे लिखने की गुणवत्ता भी गिर जाएगी. लिखना केवल पैसे के लिए नहीं होना चाहिए. कुछ लोग पैसे के लिए काम करते हैं तो भी उनको ध्यान रखना चाहिए कि वे जो लिखना चाहते हैं वह लिखें न कि पैसे देकर उनसे कोई कुछ लिखवाता है तो केवल वही न करते रहें. समाजऋण भी कुछ होता है जिसको चुकाने की नैतिक जिम्मेदारी महसूस होनी चाहिए. अगर आप सिर्फ पैसे के लिए लिखेंगे तो कभी वह नहीं लिख पायेंगे जो आप लिखना चाहते थे. आप बाजार में अपना लिखा एक तराजू पर लेकर खड़े हो जाएं और अशर्फियों में बोली लगाना शुरू करेंगे तो मुश्किल होगी. फिर जो अशर्फी देगा वह आपके लिखे को ले जाएगा. असल में कापीराईट का व्यवसाय यह अशर्फी देनेवाला समाज पैदा करता है. क्योंकि उसको आपके लिखे से मुनाफा कमाना है. इसलिए लिखनेवालों को यह जरूर सोचना चाहिए कि आखिर वे किसके लिए लिख रहे हैं? एक बात जान लीजिए, अशर्फी लेकर लिखनेवाले लोग अस्तित्व में लंबे समय तक उपलब्ध नहीं रह पाते हैं. एक समय के प्रवाह में आते हैं और अशर्फी में तुलकर समाप्त हो जाते हैं. मुंबई फिल्म उद्योग में कम पैसा है? लेकिन जरा देखिए, कल के स्टार आज किस गर्त में पड़े हैं? यही आज के स्टारों के साथ कल होगा. यही बात लेखकों पर भी लागू होती है. अच्छे लिखनेवालों की कीमत बाजार में नहीं समाज में निर्धारित होनी चाहिए.
         जहां तक आजीविका चलाने की बात है तो इसमें व्यावहारिक दिक्कत कम और मानसिक संकट ज्यादा है. अगर हम बुद्धि के श्रम के साथ थोड़ा शरीर का श्रम भी जोड़ दें तो दिक्कत नहीं होगी. आखिर क्यों हम केवल बुद्धि के श्रम की कमाई ही खाना चाहते हैं? यह तो विकार है. सड़क पर कूदने से अच्छा है कि थोड़ी देर खेत में कूद लो. थोड़ा श्रम करके पूंजी अर्जित कर लो. केवल अपने लिखे का मत खाओ. तब शायद ज्यादा अच्छा लिख सकोगे. ऐसा जीवन मत जियो जो केवल लिखने पर टिका हो.

सवाल- टेक्नॉलाजी के इस युग में कापीराईट कितना प्रासंगिक रह गया है?
जवाब- टेक्नालाजी और कापीराईट दो विरोधाभासी तत्व हैं. जब टेपरिकार्डर आया तो वह सूटकेस के आकार में था. आप किसी जगह भाषण देते थे तो वह रिकार्ड होना शुरू हो गया. इसके बाद टेपरिकार्डर का आकार छोटा होता गया और आज हम मोबाइल में ही सब कुछ रिकार्ड कर सकते हैं. अब सोचिए किसी के भाषण पर कापीराईट का अब क्या मतलब? मेरे बोले को कौन कैसे रिकार्ड करके कहां पहुंचा देगा, मैं भला कैसे जान पाऊंगा? जैसे टेपरिकार्डर ने एक तरह के कापीराईट को खत्म किया उसी तरह फोटोकापी मशीन ने लिखे के कापीराईट को अप्रासंगिक बना दिया. अब कम्प्यूटर ने तो सारी हदें तोड़ दी हैं. पहले तो हाथ से मजदूरी करके कापी करना होता था लेकिन टेक्नालाजी ने शेयरिंग का सब काम आसान कर दिया है. फिर क्यों झंझट मोल लेते हो? संभवत: टेक्नालाजी हमें बता रही है कि देखो राजा! शब्दों की चौकीदारी संभव नहीं. इसलिए इसका आग्रह छोड़ दो. जो संभव नहीं, उसका आग्रह रखने की क्या जरूरत है?

सवाल- आपने कहा कि केवल अपने िलखे का मत खाओ. क्या इसको आप थोड़ा और स्पष्ट करेंगे?
जवाब- ऐसा कहने का मेरा आशय है कि इतना अच्छा लिखो कि तुम्हारे लिखे का कोई और भी खाये. मैं ऐसा नहीं कह रहा कि आपके लिखे का सिर्फ प्रकाशक खाये. कुछ ऐसा लिखिए कि समाज के लोगों को कुछ फायदा हो. उनका जीवन सुधरे. उनका पानी रुके. उनका अकाल दूर हो. बाढ़ में चार गांव तैर जाएं. कुछ ऐसा लिख दो कि संकट में लोगों के लिए वह संबल की तरह काम आये. हो सकता है कि इसके लिए पैसा न मिले लेकिन बदले में और भी बहुत कुछ मिलेगा जो पैसे से ज्यादा कीमती होगा. लिखनेवाली जमात को यह समझना होगा.

सवाल- आपने अपने लिखे पर कभी कापीराईट नहीं रखा. क्या आपको जीवन में आर्थिक संकट नहीं उठाना पड़ा?
जवाब- प्राप्ति सिर्फ पैसे की ही नहीं होती है. मुझे पैसा नहीं मिला लेकिन बदले में समाज का इतना प्यार मिला है जिसके सामने पैसे का कोई मोल नहीं है. मैं एक सामाजिक संस्था (गांशी शांति प्रतिष्ठान) में काम करता हूं और कल्पना से भी बहुत कम मानदेय प्राप्त करता हूं. लेकिन मुझे जीवन में न कोई शिकायत है और न ही कोई संकट. मैंने पैंतीस साल पहले ही तय कर लिया था कि मुझे अपने लिखे पर कोई कापीराईट नहीं रखना है. और आज तक नहीं रखा और न आगे कभी होगा. कुछ अप्रिय प्रसंग जरूर आये लेकिन व्यापक तौर पर तो समाज का फायदा ही हुआ और बदले में मुझे उनका अथाह प्यार और सहयोग मिला. आप देखिए दुनिया में तो अब एक नया फैशन ही चल पड़ा है कापी लेफ्ट का. खुले समाज की नयी परिभाषाएं बन रही हैं तो फिर हम अपनी ओर से उस खुले समाज के गुल्लक में एक सिक्का क्यों नहीं डालते? अच्छी चीज को रोककर आखिर हम क्या करेंगे? अगर हम सब बातों में खुलापन चाहते हैं तो अपने ही लिखे पर प्रतिबंध क्यों लगाएं? वैसे भी अब टेक्नालाजी इसकी इजाजत नहीं देती है.

सवाल- क्या अधिकार का दावा छोड़ना ही एकमात्र रास्ता है?
जवाब- जी बिल्कुल. यही प्राकृतिक व्यवस्था है. क्या अनाज अपने ऊपर कापीराईट रखता है कि एक दाना बोएंगे तो सिर्फ एक दाना ही वापस मिलेगा? पेड़ पौधे अपने ऊपर कापीराईट रखते हैं? पानी अपने ऊपर कापीराईट रखता है? तो फिर विचार पर कापीराईट क्यों होना चाहिए? प्रकृति हमकों सिखाती है कि चीजें फैलाने के लिए बनायी गयी हैं.

सवाल- कापीराईट और लाभ की मानसिकता ने क्या चौथे खंभे पत्रकारिता के सामने भी संकट पैदा किया है?
जवाब- पहले तो इसे चौथा खंभा क्यों कहते हो? हमने एक काल्पनिक महल खड़ा कर लिया जिसके चार खभे बना लिये हैं. मुझे तो चारो खभों के बारे में शक है. ऐसे खंभे पर टिकाते जाएं तो फिर बारहखंभा में क्या दुर्गुण है? सड़क पर एक हवेली थी उसमें बारह खंभे थे इसलिए उसका नाम बारह खंभा हो गया. ये लोकतंत्र के सभी खंभे बालू की भीत में लगे हवा के खंभे हैं. चौथा खंभा भी खंभा नहीं बल्कि खोमचा है. आप देखिए अब खबरें बिक रही हैं तो आप इसे खंभा कहेंगे या फिर खोमचा? इस खोमचे में काम करनेवाले पत्रकार भी इस पतन के लिए उतने ही जिम्मेदार हैं जितने खोमचे के मालिक. पत्रकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते.

Courtesy by Sanjay Tiwari on behalf of www.visfot.com

Tuesday, April 13, 2010




दंतेवाड़ा में नक्सलियों से मुलाकात के चक्कर में प्रख्यात लेखिका अरूंधती राय नप सकती हैं। नक्सलियों को महिमामंडित करने की छत्तीसगढ़ के एक सामाजिक कार्यकर्ता की शिकायत पर उनके खिलाफ  डीजीपी विश्व रंजन  ने जांच के निर्देश दिए हैं।




(विस्तृत खबर पढ़ें)












साभार- नई दुनिया